यू. आर. अनन्तमूर्ति भारतीय भाषा कन्नड़ के नव्या आन्दोलन के प्रमुख रचनाकारों में से एक है। वे एक ब्राह्मण परिवार से तालुक्क रखते थे, जिस कारण ब्राह्मण समाज में फैल रहे विकृतियों को काफी नजदीक से देख रहे थे। अंग्रेजी के अध्यापक होने और इंग्लैंड में पी.एच.डी पूरी करने के कारण वो भारतीय और पाश्चात्य समाज से काफ़ी हद तक जुड़े हुए थे और उसपर अपनी एक दृष्टि निर्मित किये हुए थे, जो उनके लेखन के बीज के रूप में देखने को मिलता है। आजादी के बाद के समय में,जब भारत में सभी को स्वतंत्रता का
अधिकार हुआ; धार्मिक आधार पर शोषण पर पाबन्दी लगी;और लोगो को धर्म चयन की स्वतंत्रता मिली तो उन्होंने देखा कि किस तरह से समाज में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है, जिसमें व्यक्ति अपने अनुसार धर्म चयन के साथ-साथ उसकी व्याख्या भी अपने फायदे के अनुसार करने लगा है।
हिंदी साहित्य में नयी कहानी के समय में कन्नड़ में जिस आन्दोलन की शुरुआत हुई वह नव्या आन्दोलन थी। इसके रचनाकार अपने सांस्कृतिक परिवेश और परिस्थितियों में व्यक्ति स्वतंत्र और उसके अस्तित्व के प्रश्न को उठाते है। अनंतमूर्ति इन रचनाकारों में से एक है। इन्होने संस्कार(1965), भारतीपुर(1973), अवस्था(1978), भव(1997) और दिव्य जैसी रचनाकी है और इसमें संस्कृति के प्रश्नों को उठाया ही नहीं बल्कि उसके समाधान के भी उपाय दिए है। संस्कार इनकी प्रमुख रचनाओं में से एक है, जिसका हिंदी में अनुवाद चंद्रकान्त कुसनूर ने किया। यह तीन भागों में विभाजित है, जिसका पहला भाग 10 भागो में, दूसरा भाग 6 भागो में वहीं तीसरा भाग 2 भागो में विभाजित है। इसके पहले भाग में दुर्वासापुर के समस्त ब्राह्मण और मरे हुए नारणप्पा के शव संस्कार के समस्या के वर्णन से सम्बन्धित है; दूसरा भाग प्राणेशाचार्य और चंद्री के शारीरिक मिलन और उसके उपरांत प्राणेशाचार्य के मन में होने वाले संघर्ष का वर्णन है; वहीं तीसरे भाग में प्राणेशाचार्य को रास्ते में मिले पुट्टू के साथ संवाद और अंत में प्राणेशाचार्य के दुर्वासापुर वापसी से सम्बन्धित है।
जब किसी भी रचना की सांस्कृतिक दृष्टि पर बात की जाती है, तो उसमें संस्कृति के पूर्व से आ रही परम्परा, वर्तमान समय की समस्या और भविष्य में उसे दूर करने के लिए क्या किये जा रहे है; वह कितने कारगर है;और उसके स्वरुप क्या होने चाहिए;इसपर विचार करना होता है। इस प्रकार हम इसमें इन आधारों पर इसपर बेहतर तरीके से बात कर सकते हैं। इस सन्दर्भ में हम इसमें आये समस्याओं पर चर्चा करने के साथ, प्राचीन काल से चली आ रही मान्यता से हल होने न होने की स्थिति, प्राचीन मान्यताओं की उपयोगिता/अनुपयोगिता और नये मूल्यों के स्वीकार की आवश्यकता आदि पर विचार कर सांस्कृतिक दृष्टियों पर विचार कर सकते है।
संस्कार उपन्यास का प्रारंभ प्राणेशाचार्य के दैनिक कार्यों के प्रारंभ होता है"भागीरथी की सूखी-सिकुड़ी देह को नहलाकर उन्होंने उसे कपडे पहना दिये। फिर हमेशा कीदिनचर्या की तरह पूजा-नैवेद्यादि संपन्न करके देवता के प्रसाद का फूल उसके बालों में लगाया;चरणामृत पिलाया।" इस प्रकार भूमिका से प्रारंभ होकर नारणप्पा की मृत्यु और उसके संस्कार से जुड़े सवाल और के साथ समाज में उसके परिणामस्वरूप खड़े होने वाले सवाल को सामने रखता है। जिसमें व्यक्ति के अस्तित्व को बचाने की समस्या से लेकर अन्य सवाल खड़े होते हैं । जिसमें ब्राह्मण कौन? निःसंतान व्यक्ति का धन किसका? तथा धर्म शास्त्रों के प्रवचन की शिक्षा और जीवन जीने की शिक्षा की आपस में टकराहट सामने आती है। इस सन्दर्भ में प्रफुल्ल कोलख्यान अपने लेख स्मृति और अनुभव के असमंजस में संस्कार में लिखते हैं" गोदान में नवाचार की संभावनाओं की तलाश है। संस्कार में पुराचार के टूटने की अंतर्व्यथा है। होरी की मृत्यु के साथ गोदान का अंत होता है और नारणप्पा की मृत्यु के साथ संस्कार का प्रारंभ"
जब तक धर्म प्राचीन समय के अनुसार चलता है,तब तक उसे न कोई दिक्कत होती है;न उससे जुड़ेलोगो को न उसे बुरा समझने वाले कि क्योंकि सभी उसके आदी हो गये होते है और उसे ही अपना मान लिया होता है। समस्या तब शुरू होती है,जब इसमें कोई अड़चन आती है;कोई ऐसी स्थिति आती है, जब इसका पालन करना मुश्किल हो जाता है। ऐसी ही स्थिति तब आती है जब चंद्री प्राणेशाचार्य को नारणप्पा की मृत्यु की सुचना देती है। ऐसी स्थिति में उसके अंतिम संस्कार को किया जाय या न किया जाय से बड़ी समस्या यह होती है कि उसकी सम्पति को कौन लेगा यही पूरे उपन्यास को बुनता है। अगर केवल समस्या होती कि इसका संस्कार करना चाहिए या नहीं, तो इसका हल निकल जाता,पर समस्या उसके सम्पति को लेकर थी सम्पति को इक्कठा करने के प्रवृति भारत में प्राचीन काल में न थी इस कारण इसका हल भी उस समय नहीं लिखा गया या यूं कहें कि इसपर उस समय ध्यान देना,धर्म-ग्रन्थ लिखने वाले लोगों के लिए आवश्यक नहीं जान पड़ा।
समाज में जब से धन-सम्पति को इकठ्ठा करने की प्रवृति विकसित हुई तो इसका निर्णय करना भी आवश्यक हो गया। ऐसे में नारणप्पा ब्राह्मण है या नहीं; उसका संस्कार होना चाहिए या नहीं;इसका तो निर्णय कर लेते है पर जब स्थिति यह आती है कि संस्कार के साथ उसके संपति के बंटवारे की बात आती है ऐसे में पहले जो प्रश्न यह था कि नारणप्पा के अगर कोई आस-पास में कोई रिश्तेदार है वह उसका संस्कार कर सकता है तो जो गरुड़ाचार्य और लक्ष्मणाचार्य अपने से उसे अलग बताते थे; उससे सारे रिश्ते टूटे हुए बताते थे; वहीँ यह चाहने लगे की संस्कार चाहे करना पड़े तो पड़े लेकिन गहने किसी और के न होने चाहिए धन किसी के नहीं होने चाहिए। जो उनको पहले डर था कि लोग बुलाएँगे नहीं अब दोनों लाभ के लिए आतुर होते है संस्कार करने का अधिकार प्राणेशाचार्य दे दें, ताकि उन्हें इस समस्या का हल हो जाए और उनका बेटा भी वापस आ जाए। अनसुईया के मनमें जब यह ख्याल आता है कि उसके बेटे को स्वीकार किया जायेगा या नहीं, तो उसे इसका विश्वास होता हैं कि प्राणेशाचार्य, नारणप्पा को क्षमा कर देते हैं, तो उसके बेटे को भी नही निकालेंगे। इन सभी बिन्दुओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर देखा जा सकता है। इस प्रकार की सांस्कृतिक दृष्टियों को निम्नलिखित रूप में लिखा जा सकता है।
1.बिना संतान वाले व्यक्ति का धन किसका?
जब नारणप्पा की मृत्यु होती है, तो समान्यतः तो यह समस्या सामने आती हुई लगती है कि वह ब्राह्मण था या नहीं? प्राणेशाचार्य सोचते हैं"पहला प्रश्न तो यह है कि नारणप्पा का शव संस्कार होना चाहिए या नहीं उसकी कोई संतान नहीं है। किसी अन्य को उसका शव संस्कार करना चाहिए यह दूसरा प्रश्न है।"हालांकि वे इन दोनों प्रश्नों का हल निकाल लेते हैं कि नारणप्पा ने भले ही ब्राह्मणत्व का त्याग कर दिया था पर ब्राह्मणत्व ने उसका त्याग नहीं किया इसलिए वह ब्राह्मण रहकर ही मरा है इसलिए उसके शव को ब्राह्मण के अलावा कोई और स्पर्श नहीं करना चाहिए।
“उसके (नारणाप्पा) द्वारा ब्राह्मणत्व त्याग देने पर भी ब्राह्मणत्व ने उसे नहीं त्यागा । उसका बहिष्कार नहीं किया गया । शास्त्रों के अनुसार चूँकि वह बिना बहिष्कृत हुये मरा है, इसलिए वह ब्राह्मण रहकर ही मरा है । देखा जाय तो जो ब्राह्मण नहीं हैं उनको उसके शव को छूने का अधिकार नहीं है । उनके लिए उसके शव को स्पर्श करने को छोड़ देंगे तो हम अपने ब्राह्मणत्व की ही प्रवंचना करेंगे ।”
तब यह समस्या आती है कि उसके संतान न होने के कारण उसके निकट के सम्बन्धी संस्कार कर सकते है।
प्राणेशाचार्य कहते हैं कि, “कोई रिश्तेदार न हो तो और कोई ब्राह्मण यह कार्य कर सकता है- ऐसी बात धर्मशास्त्र में है।”(संस्कार, पृष्ठ-15)
ऐसे में लोगों के तैयार न होने को देखकर चंद्री अपना गहना आचार्यजी के सामने शव के संस्कार के लिए रखती है। जहाँ से यह प्रश्न उलझ जाता है। जो लक्ष्मणाचार्य और गरुड़ाचार्य अपने से उसका कोई सम्बन्ध नहीं मानते थे वहीँ उसके शव का संस्कार करने के लिए तैयार हो जाते हैं। धन के मामले में फैसला लेते समय जरा सी भी गलती उसी तरह गलत दाग लगा देती है जैसे वेश्या के संपर्क में रहकर व्यक्ति बुरा कहलाने लगता है। हालाँकि जब यह उनके पड़ोसी गाँव के ब्राह्मण के पास चली जाती है, तो यह अलग मोड़ पर आ जाती है। उन्हें भी लगता है कि सब कुछ तो ठीक है पर आचार्यजी बहुत ज्ञानी है, वेदान्त के ज्ञाता है। वो इसका क्या हल निकलते है उसके बाद हम संस्कार करने को तैयार है।इधर अनुसुईया इस बात से डर रही है कि अगर इसका संस्कार करने को तैयार हो गए, तो फिर उनका धन लुट जायेगा।
उपन्यास में दासाचार्य के माध्यम से उपन्यासकार ने कई प्रकार के हल सुझाये है। जैसे वे कहते है कि पहले शव के संस्कार पर सोंचा जाय, उसके बाद,जो भी संपति हो उससे हनुमान जी का मुकुट बना दिया जाय। इस बात से प्राणेशाचार्य सहमत हो सकते थे; और यह समस्या हल हो सकती थी। शव का संस्कार पास के गाँव के उसके मित्र मंजय्या से करवाया जाता और सभी अपने अपने स्थान पर आ जाते। यही समाधान मठ के आचार्य भी बताते है कि शव का संस्कार तो होना चाहिए पर चूकी उसने ब्राह्मण धर्म का पालन नहीं किया है, तो उसका पर्याश्चित भी होना चाहिए और इसके लिए उसकी सम्पति को मठ में दान देनी होगी। जब उसपर लक्ष्मणाचार्य यह कहते है कि उसके बाग़ में से 300 पेड़ उसे मिलने चाहिए, तो मठ के आचार्य कहते है कि अगर मै शव संस्कार का आदेश न दूँ, तो और लक्ष्मणाचार्य को उनकी बात माननी पड़ती है।
दूसरी ओर एक दृश्य यह भी उपन्यास में आता हैं कि वैश्या के यहाँ जब पति-पत्नी की मौत हो जाती है, तो लोग उसका घर ही फूंक देते है और सारे काम हो जाते है। हालाँकि यहाँ पर यह विचार करना आवश्यक है कि आखिर कौन सा माध्यम बेहतर है, किसके माध्यम से इसका बेहतर हल किया जा सकता है।
ऐसे में हम कह सकते हैं कि आधुनिक दृष्टि से देखने पर यद्यपि मूर्ति के मुकुट बनवाने से किसी को कुछ फायदा नहीं होगा, पर इस सवाल का हल इसी प्रकार निकालना तब तक बेहतर है, जब तक लोगो में धर्म से डर है। अगर ऐसा न हो तो पक्षपात की स्थिति से बचकर निकलना मुश्किल है; और उसमें गलती होने से बदनामी होने का भी डर है।
2. ब्राह्मण कौन?
इस उपन्यास में,जो एक मुख्य संस्कृति दृष्टिकोण सामने आया है, वो है ब्रह्मण के अलग-2 रूप। एक है, जो पूरी तरह से धर्म शास्त्र से जुड़ा हुआ है जिसमें प्राणेशाचार्य आते हैं, जिन्हें प्रायः सभी ब्राह्मण मानते है। दूसरे वे ब्राह्मण हैं, जो कहने को तो ब्राह्मण है पर विधवाओं की सम्पति हड़पना और दूसरे के धन पर नजर रखने वाले;वहीँ दासाचार्य जैसे ब्राह्मण है जो सिर्फ भोजन के बारे में ही सोचते हैं। ब्राह्मणत्व की दुहाई देने के बावजूद भी अपने पड़ोस के गाँव परिजातपुर में शव-संस्कार से पहले ही अपने से नीची जाति के ब्राह्मण के यहाँ भोजन कर आते हैं और मंजय्या को किसी को भी बताने से मना करते हैं। तीसरे ब्राह्मण वे जो माधव और स्मार्त के रूप में ऊँच-नीच में बंटे है। चौथा ब्राह्मण वह है, जो नारणप्पा है, जो मांस खाता है; शराब का सेवन करता है; वेश्या के साथ सहवास करता है और सालों से पूजे जा रहे शालिग्राम को नदी में फेंकता है और साथ ही ब्राह्मण लोगों को शूद्रों को मन्दिर में प्रवेश देने की बात करता हैं। वहीं एक ब्राह्मण वे हैं, जो मठ में है और शव के संस्कार की अनुमति इस आधार पर देते हैं कि उसकी सम्पति को मठ के हवाले किया जाना चाहिए जिससे नारणप्पा के गलत कार्यों का पर्याश्चित हो सके। पर इस बात पर शव संस्कार की अनुमति नहीं भी देने की धमकी देते है जब लक्ष्मण यह कहता है कि उसके बाग़ के पेड़ उसे मिलने चाहिए।
इसपर विचार करने पर हम देखते हैं कि केवल प्राणेशाचार्य को ब्राह्मण माना जा सकता है
क्योंकि वे निश्छल और धर्म आधारित आचरण के साथ बिना किसी लोभ से अपना जीवन जीते है;हालाँकि उनमें वह निर्णय क्षमता होनी चाहिए, जो किसी समस्या की स्थिति में सवाल को हल केवल अपने शास्त्र के बल पर ही नहीं बल्कि अपने विवेक के आधार पर करें। उन्हें लकीर का फकीर नहीं बनना चाहिए। अन्य को इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि वे तन से तो ब्राह्मण है पर मन से छल और ईष्या लोभ आदि में संलिप्त है।
अधिकार हुआ; धार्मिक आधार पर शोषण पर पाबन्दी लगी;और लोगो को धर्म चयन की स्वतंत्रता मिली तो उन्होंने देखा कि किस तरह से समाज में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है, जिसमें व्यक्ति अपने अनुसार धर्म चयन के साथ-साथ उसकी व्याख्या भी अपने फायदे के अनुसार करने लगा है।
हिंदी साहित्य में नयी कहानी के समय में कन्नड़ में जिस आन्दोलन की शुरुआत हुई वह नव्या आन्दोलन थी। इसके रचनाकार अपने सांस्कृतिक परिवेश और परिस्थितियों में व्यक्ति स्वतंत्र और उसके अस्तित्व के प्रश्न को उठाते है। अनंतमूर्ति इन रचनाकारों में से एक है। इन्होने संस्कार(1965), भारतीपुर(1973), अवस्था(1978), भव(1997) और दिव्य जैसी रचनाकी है और इसमें संस्कृति के प्रश्नों को उठाया ही नहीं बल्कि उसके समाधान के भी उपाय दिए है। संस्कार इनकी प्रमुख रचनाओं में से एक है, जिसका हिंदी में अनुवाद चंद्रकान्त कुसनूर ने किया। यह तीन भागों में विभाजित है, जिसका पहला भाग 10 भागो में, दूसरा भाग 6 भागो में वहीं तीसरा भाग 2 भागो में विभाजित है। इसके पहले भाग में दुर्वासापुर के समस्त ब्राह्मण और मरे हुए नारणप्पा के शव संस्कार के समस्या के वर्णन से सम्बन्धित है; दूसरा भाग प्राणेशाचार्य और चंद्री के शारीरिक मिलन और उसके उपरांत प्राणेशाचार्य के मन में होने वाले संघर्ष का वर्णन है; वहीं तीसरे भाग में प्राणेशाचार्य को रास्ते में मिले पुट्टू के साथ संवाद और अंत में प्राणेशाचार्य के दुर्वासापुर वापसी से सम्बन्धित है।
जब किसी भी रचना की सांस्कृतिक दृष्टि पर बात की जाती है, तो उसमें संस्कृति के पूर्व से आ रही परम्परा, वर्तमान समय की समस्या और भविष्य में उसे दूर करने के लिए क्या किये जा रहे है; वह कितने कारगर है;और उसके स्वरुप क्या होने चाहिए;इसपर विचार करना होता है। इस प्रकार हम इसमें इन आधारों पर इसपर बेहतर तरीके से बात कर सकते हैं। इस सन्दर्भ में हम इसमें आये समस्याओं पर चर्चा करने के साथ, प्राचीन काल से चली आ रही मान्यता से हल होने न होने की स्थिति, प्राचीन मान्यताओं की उपयोगिता/अनुपयोगिता और नये मूल्यों के स्वीकार की आवश्यकता आदि पर विचार कर सांस्कृतिक दृष्टियों पर विचार कर सकते है।
संस्कार उपन्यास का प्रारंभ प्राणेशाचार्य के दैनिक कार्यों के प्रारंभ होता है"भागीरथी की सूखी-सिकुड़ी देह को नहलाकर उन्होंने उसे कपडे पहना दिये। फिर हमेशा कीदिनचर्या की तरह पूजा-नैवेद्यादि संपन्न करके देवता के प्रसाद का फूल उसके बालों में लगाया;चरणामृत पिलाया।" इस प्रकार भूमिका से प्रारंभ होकर नारणप्पा की मृत्यु और उसके संस्कार से जुड़े सवाल और के साथ समाज में उसके परिणामस्वरूप खड़े होने वाले सवाल को सामने रखता है। जिसमें व्यक्ति के अस्तित्व को बचाने की समस्या से लेकर अन्य सवाल खड़े होते हैं । जिसमें ब्राह्मण कौन? निःसंतान व्यक्ति का धन किसका? तथा धर्म शास्त्रों के प्रवचन की शिक्षा और जीवन जीने की शिक्षा की आपस में टकराहट सामने आती है। इस सन्दर्भ में प्रफुल्ल कोलख्यान अपने लेख स्मृति और अनुभव के असमंजस में संस्कार में लिखते हैं" गोदान में नवाचार की संभावनाओं की तलाश है। संस्कार में पुराचार के टूटने की अंतर्व्यथा है। होरी की मृत्यु के साथ गोदान का अंत होता है और नारणप्पा की मृत्यु के साथ संस्कार का प्रारंभ"
समाज में जब से धन-सम्पति को इकठ्ठा करने की प्रवृति विकसित हुई तो इसका निर्णय करना भी आवश्यक हो गया। ऐसे में नारणप्पा ब्राह्मण है या नहीं; उसका संस्कार होना चाहिए या नहीं;इसका तो निर्णय कर लेते है पर जब स्थिति यह आती है कि संस्कार के साथ उसके संपति के बंटवारे की बात आती है ऐसे में पहले जो प्रश्न यह था कि नारणप्पा के अगर कोई आस-पास में कोई रिश्तेदार है वह उसका संस्कार कर सकता है तो जो गरुड़ाचार्य और लक्ष्मणाचार्य अपने से उसे अलग बताते थे; उससे सारे रिश्ते टूटे हुए बताते थे; वहीँ यह चाहने लगे की संस्कार चाहे करना पड़े तो पड़े लेकिन गहने किसी और के न होने चाहिए धन किसी के नहीं होने चाहिए। जो उनको पहले डर था कि लोग बुलाएँगे नहीं अब दोनों लाभ के लिए आतुर होते है संस्कार करने का अधिकार प्राणेशाचार्य दे दें, ताकि उन्हें इस समस्या का हल हो जाए और उनका बेटा भी वापस आ जाए। अनसुईया के मनमें जब यह ख्याल आता है कि उसके बेटे को स्वीकार किया जायेगा या नहीं, तो उसे इसका विश्वास होता हैं कि प्राणेशाचार्य, नारणप्पा को क्षमा कर देते हैं, तो उसके बेटे को भी नही निकालेंगे। इन सभी बिन्दुओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर देखा जा सकता है। इस प्रकार की सांस्कृतिक दृष्टियों को निम्नलिखित रूप में लिखा जा सकता है।
1.बिना संतान वाले व्यक्ति का धन किसका?
जब नारणप्पा की मृत्यु होती है, तो समान्यतः तो यह समस्या सामने आती हुई लगती है कि वह ब्राह्मण था या नहीं? प्राणेशाचार्य सोचते हैं"पहला प्रश्न तो यह है कि नारणप्पा का शव संस्कार होना चाहिए या नहीं उसकी कोई संतान नहीं है। किसी अन्य को उसका शव संस्कार करना चाहिए यह दूसरा प्रश्न है।"हालांकि वे इन दोनों प्रश्नों का हल निकाल लेते हैं कि नारणप्पा ने भले ही ब्राह्मणत्व का त्याग कर दिया था पर ब्राह्मणत्व ने उसका त्याग नहीं किया इसलिए वह ब्राह्मण रहकर ही मरा है इसलिए उसके शव को ब्राह्मण के अलावा कोई और स्पर्श नहीं करना चाहिए।
“उसके (नारणाप्पा) द्वारा ब्राह्मणत्व त्याग देने पर भी ब्राह्मणत्व ने उसे नहीं त्यागा । उसका बहिष्कार नहीं किया गया । शास्त्रों के अनुसार चूँकि वह बिना बहिष्कृत हुये मरा है, इसलिए वह ब्राह्मण रहकर ही मरा है । देखा जाय तो जो ब्राह्मण नहीं हैं उनको उसके शव को छूने का अधिकार नहीं है । उनके लिए उसके शव को स्पर्श करने को छोड़ देंगे तो हम अपने ब्राह्मणत्व की ही प्रवंचना करेंगे ।”
तब यह समस्या आती है कि उसके संतान न होने के कारण उसके निकट के सम्बन्धी संस्कार कर सकते है।
प्राणेशाचार्य कहते हैं कि, “कोई रिश्तेदार न हो तो और कोई ब्राह्मण यह कार्य कर सकता है- ऐसी बात धर्मशास्त्र में है।”(संस्कार, पृष्ठ-15)
ऐसे में लोगों के तैयार न होने को देखकर चंद्री अपना गहना आचार्यजी के सामने शव के संस्कार के लिए रखती है। जहाँ से यह प्रश्न उलझ जाता है। जो लक्ष्मणाचार्य और गरुड़ाचार्य अपने से उसका कोई सम्बन्ध नहीं मानते थे वहीँ उसके शव का संस्कार करने के लिए तैयार हो जाते हैं। धन के मामले में फैसला लेते समय जरा सी भी गलती उसी तरह गलत दाग लगा देती है जैसे वेश्या के संपर्क में रहकर व्यक्ति बुरा कहलाने लगता है। हालाँकि जब यह उनके पड़ोसी गाँव के ब्राह्मण के पास चली जाती है, तो यह अलग मोड़ पर आ जाती है। उन्हें भी लगता है कि सब कुछ तो ठीक है पर आचार्यजी बहुत ज्ञानी है, वेदान्त के ज्ञाता है। वो इसका क्या हल निकलते है उसके बाद हम संस्कार करने को तैयार है।इधर अनुसुईया इस बात से डर रही है कि अगर इसका संस्कार करने को तैयार हो गए, तो फिर उनका धन लुट जायेगा।
उपन्यास में दासाचार्य के माध्यम से उपन्यासकार ने कई प्रकार के हल सुझाये है। जैसे वे कहते है कि पहले शव के संस्कार पर सोंचा जाय, उसके बाद,जो भी संपति हो उससे हनुमान जी का मुकुट बना दिया जाय। इस बात से प्राणेशाचार्य सहमत हो सकते थे; और यह समस्या हल हो सकती थी। शव का संस्कार पास के गाँव के उसके मित्र मंजय्या से करवाया जाता और सभी अपने अपने स्थान पर आ जाते। यही समाधान मठ के आचार्य भी बताते है कि शव का संस्कार तो होना चाहिए पर चूकी उसने ब्राह्मण धर्म का पालन नहीं किया है, तो उसका पर्याश्चित भी होना चाहिए और इसके लिए उसकी सम्पति को मठ में दान देनी होगी। जब उसपर लक्ष्मणाचार्य यह कहते है कि उसके बाग़ में से 300 पेड़ उसे मिलने चाहिए, तो मठ के आचार्य कहते है कि अगर मै शव संस्कार का आदेश न दूँ, तो और लक्ष्मणाचार्य को उनकी बात माननी पड़ती है।
दूसरी ओर एक दृश्य यह भी उपन्यास में आता हैं कि वैश्या के यहाँ जब पति-पत्नी की मौत हो जाती है, तो लोग उसका घर ही फूंक देते है और सारे काम हो जाते है। हालाँकि यहाँ पर यह विचार करना आवश्यक है कि आखिर कौन सा माध्यम बेहतर है, किसके माध्यम से इसका बेहतर हल किया जा सकता है।
ऐसे में हम कह सकते हैं कि आधुनिक दृष्टि से देखने पर यद्यपि मूर्ति के मुकुट बनवाने से किसी को कुछ फायदा नहीं होगा, पर इस सवाल का हल इसी प्रकार निकालना तब तक बेहतर है, जब तक लोगो में धर्म से डर है। अगर ऐसा न हो तो पक्षपात की स्थिति से बचकर निकलना मुश्किल है; और उसमें गलती होने से बदनामी होने का भी डर है।
2. ब्राह्मण कौन?
इस उपन्यास में,जो एक मुख्य संस्कृति दृष्टिकोण सामने आया है, वो है ब्रह्मण के अलग-2 रूप। एक है, जो पूरी तरह से धर्म शास्त्र से जुड़ा हुआ है जिसमें प्राणेशाचार्य आते हैं, जिन्हें प्रायः सभी ब्राह्मण मानते है। दूसरे वे ब्राह्मण हैं, जो कहने को तो ब्राह्मण है पर विधवाओं की सम्पति हड़पना और दूसरे के धन पर नजर रखने वाले;वहीँ दासाचार्य जैसे ब्राह्मण है जो सिर्फ भोजन के बारे में ही सोचते हैं। ब्राह्मणत्व की दुहाई देने के बावजूद भी अपने पड़ोस के गाँव परिजातपुर में शव-संस्कार से पहले ही अपने से नीची जाति के ब्राह्मण के यहाँ भोजन कर आते हैं और मंजय्या को किसी को भी बताने से मना करते हैं। तीसरे ब्राह्मण वे जो माधव और स्मार्त के रूप में ऊँच-नीच में बंटे है। चौथा ब्राह्मण वह है, जो नारणप्पा है, जो मांस खाता है; शराब का सेवन करता है; वेश्या के साथ सहवास करता है और सालों से पूजे जा रहे शालिग्राम को नदी में फेंकता है और साथ ही ब्राह्मण लोगों को शूद्रों को मन्दिर में प्रवेश देने की बात करता हैं। वहीं एक ब्राह्मण वे हैं, जो मठ में है और शव के संस्कार की अनुमति इस आधार पर देते हैं कि उसकी सम्पति को मठ के हवाले किया जाना चाहिए जिससे नारणप्पा के गलत कार्यों का पर्याश्चित हो सके। पर इस बात पर शव संस्कार की अनुमति नहीं भी देने की धमकी देते है जब लक्ष्मण यह कहता है कि उसके बाग़ के पेड़ उसे मिलने चाहिए।
इसपर विचार करने पर हम देखते हैं कि केवल प्राणेशाचार्य को ब्राह्मण माना जा सकता है
क्योंकि वे निश्छल और धर्म आधारित आचरण के साथ बिना किसी लोभ से अपना जीवन जीते है;हालाँकि उनमें वह निर्णय क्षमता होनी चाहिए, जो किसी समस्या की स्थिति में सवाल को हल केवल अपने शास्त्र के बल पर ही नहीं बल्कि अपने विवेक के आधार पर करें। उन्हें लकीर का फकीर नहीं बनना चाहिए। अन्य को इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि वे तन से तो ब्राह्मण है पर मन से छल और ईष्या लोभ आदि में संलिप्त है।
3.धर्म में कुछ खामियां होने से उसे छोड़ देना बेहतर या उसे उसमें रहकर सुधारना:
आजादी के बाद भी कई सारे व्यक्तियों ने धर्म परिवर्तन किये, जिसके लिए उनका एक ही मत था कि उस धर्म की कमियां उन्हें पसंद नहीं आई। पर क्या यह सही है कि जब कोई धर्म गलत लगे, तो उसे छोड़कर दूसरा धर्म स्वीकार कर ली जाय। अंग्रेजी के अध्यापक होने के साथ भी अनन्तमूर्ति कन्नड़ में ही रचना करते थे। और बाहरी व्यक्ति सा चुनौती देने की जगह उसमें शामिल रहकर उसकी आलोचना को मानते है।इसी कारण वे प्राणेशाचार्य को अपने पहचान से अलग होकर जीने को समस्या का समाधान न बनाकर के पुनः उनका दुर्वासापुर में प्रवेश कराते है।
आजादी के बाद भी कई सारे व्यक्तियों ने धर्म परिवर्तन किये, जिसके लिए उनका एक ही मत था कि उस धर्म की कमियां उन्हें पसंद नहीं आई। पर क्या यह सही है कि जब कोई धर्म गलत लगे, तो उसे छोड़कर दूसरा धर्म स्वीकार कर ली जाय। अंग्रेजी के अध्यापक होने के साथ भी अनन्तमूर्ति कन्नड़ में ही रचना करते थे। और बाहरी व्यक्ति सा चुनौती देने की जगह उसमें शामिल रहकर उसकी आलोचना को मानते है।इसी कारण वे प्राणेशाचार्य को अपने पहचान से अलग होकर जीने को समस्या का समाधान न बनाकर के पुनः उनका दुर्वासापुर में प्रवेश कराते है।
“मैं अपने आभ्यंतर का आलोचक (Critical Insider) हूँ । अपनी संस्कृति को अपनी ही दृष्टि से देखना, अनुमान करना हमारे लिए महत्वपूर्ण है । हमारी परम्परा का विकास इसी कारण हुआ है । वेद की परम्परा आयी बुद्ध ने इस पर प्रश्न किया । मैं भी उसी परम्परा का हूँ । साहित्य का हूँ, साहित्य में भी बसवण्णा, कनक दास, कुमार व्यास, नवोदय लेखक, नव्य लेखकों की परम्परा का । कालानुक्रम में इसी साहित्यिक परंपरा से प्रश्न करते, धक्का देते हुए, उसका विकास करते हुए हम आए हैं ।”[यू. आर. अनंतमूर्ति, किस प्रकार की है यह भारतीयता - (संकलन व सम्पादन : नंदकुमार हेगड़े, प्रो. नूरजहाँ बेगम), राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दिल्ली, संस्करण (2004), पृ. X (भूमिका).]
वे लिखते हैं –“परम्परा से मेरा झगड़ा किसी बाहरी व्यक्ति का सा नाता नहीं रखता, बल्कि उसके भीतर बसे व्यक्ति का सा नाता है मेरा । इसलिए मैं उसमें अपने आप को एक आलोचनशील अन्तर्वासी की तरह पाता हूँ । कन्नड़ साहित्य की परम्परा से भी मुझे अपने इस प्रयत्न में मार्ग-दर्शन मिलता है । हमारे आदि कवि पम्प स्वयं जैन होते हुए भी एक हिन्दू राजा के दरबार में रहे और कन्नड़ में महाभारत की रचना की । पम्प के महाभारत के वास्तविक नायक अर्जुन या कृष्ण नहीं हैं वहाँ वास्तविक नायक कर्ण है जो स्वयं कई तरह से वर्ण-व्यवस्था के ऊँच-नीच का शिकार हुआ था । बारहवीं सदी के हमारे महान शिव-भक्त वचनकार संत कवि वर्ण-व्यवस्था की, वेद की अपौरुषेयता को चुनौती देते हैं । उन्हीं दिनों महाकवि बासवण्णा ने ब्राह्मण कन्या का विवाह एक अछूत से कराया था ।’’ (यू. आर. अनंतमूर्ति, किस प्रकार की है यह भारतीयता – (संकलन व सम्पादन : नंदकुमार हेगड़े, प्रो. नूरजहाँ बेगम), राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दिल्ली, संस्करण (2004), पृ. 75)
वे आधुनिकता के सन्दर्भ में चिनुवा अचिबे के साथ अपनी बातचीत में वे किसी भी तरह के इकहरे यथार्थ भाव-बोध और विचार-बोध को आधुनिकता विरोधी मानते है। उनकी दृढ आस्था है कि हमारी आधुनिकता इस लोकतान्त्रिक-प्रक्रिया और संघर्ष से निर्धारित होगी कि उसमें विभिन्न धर्मों, विभिन्न विचारों और मान्यताओं के साथ विविध जातियों और वर्णों की समाई कितनी है। एक जाति, एक धर्म एक संस्कृति, एक विचार ये सब तानाशाही को बढ़ाते है।
4.अस्तित्व के प्रश्न (नारणप्पा बनाम प्राणेशाचार्य)
इस उपन्यास में व्यक्ति अस्तित्व की सांस्कृतिक दृष्टि एक महत्वपूर्ण रूप में सामने आती है।जिसमें एक ओर प्राणेशाचार्य है, जो धर्म- शास्त्रों पर विश्वास करते हैं और उसके माध्यम से रहने के पक्षधर है और नारणप्पा अपने तरीके से। जिसमें अस्तित्व की सांस्कृतिक दृष्टि क्या होगी इसके सवाल को सामने रखते है। नारणप्पा कहता है कि देखते है आपकी जीत होती है या मेरी। परंपरा से चली आ रही मान्यता है कि सारे प्रश्नों का उत्तर शास्त्रों में जिसके कारण वो खुद से हल न निकालकर शास्त्र में से ही निकालने का प्रयास करते है;और जब नहीं मिलता तो कभी खुद को अयोग्य मानते है तो कभी इसे अपनी हार समझने लगते हैं। यहीं वह स्थिति है जिसके कारण व्यक्ति सुधार करना नहीं चाहता क्योंकि उसे लगता है कि दूसरे से कुछ ग्रहण कर लेने से हम हार जायेंगे;हम छोटे हो जायेंगे। यहीं भावना सुधार प्रक्रिया में बाधा बनती है। इसलिए
धर्मशास्त्रों में ऐसी शंका के हल का अभाव होगा, प्राणेशाचार्य के लिए यह विचार भय का कारण बना हुआ था ।… सनातन शास्त्रों में यदि इस प्रश्न का उत्तर नहीं है तो समझना चाहिए कि नारणप्पा की ही जीत हुयी और मेरी हार । मूल प्रश्न था, नारणप्पा के जीवित रहते समय क्यों नहीं उन्होंने उसे समाज बहिष्कृत किया ? क्या उसकी यह धमकी, कि वह मुसलमान बन जाएगा, ही उसका कारण था ? उस धमकी से ही डरकर क्यों वे धर्मशास्त्र की अवहेलना कर चुके थे ?... क्या उसके मुसलमान होकर अग्रहार में रहने की धमकी के कारण ही उसका बहिष्कार नहीं किया गया था ? नहीं । उसके प्रति कुछ सहानुभूति भी थी । अपने हृदय में अपार करुणा के ही कारण... । यह विचार आते ही उन्होंने सोचा, ‘छी: छी: ये तो अपने को धोखा देने के बराबर है । वह कलुषहीन करुणा नहीं थी ।’ उसके पीछे भयंकर हठ भी था । नारणप्पा के हठ से पराजित होने के लिए वे तैयार नहीं थे । ‘उसे धर्म के मार्ग पर लाकर ही छोड़ूँगा – अपनी पुण्य की शक्ति से, तप की शक्ति से, प्रति सप्ताह दो दिन के उपवास[15] की शक्ति से, उसमें सन्मति जाग्रत करूँगा’ – ऐसा था उनका अवश हठ ।”[16] परंतु, अब प्राणेशाचार्य से सब कुछ छूटता जा रहा है, उन्हें सब कुछ डूबता हुआ सा प्रतीत हो रहा है । यम, नियम, संयम तप सब कुछ । अब वे क्या करें ? सभी तरह के भरोसे से मन डिगता जा रहा है, कहीं कोई राह नजर नहीं आती । किस भरोसे गांव वालों को वे अब नारणप्पा का शव-संस्कार किए जाने की युक्ति दें ? गाँव वालों का भी भरोसा उनके ऊपर से उठ जाएगा । अब तो बस ईश्वर ही कोई राह दिखाएँ तो दिखाएँ । अब तो उन्हीं का एक भरोसा है – एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास । इसलिए, अगले दिन वे एकदम सुबह ही स्नानादि से निवृत्त होकर अग्रहार से कुछ दूर हनुमान जी के मंदिर पहुँचते हैं, कि अब सबके संकटमोचन हनुमान ही इस महासंकट से उन्हें मुक्त करेंगे । पर, यहाँ भी पहर, दोपहर, शाम फिर रात होने को आई किन्तु हनुमान जी की ओर से कोई जवाब कोई संकेत नहीं – न हाँ का न नहीं का । प्राणेशाचार्य यह चाहते हैं कि हाँ या ना कोई भी तो संकेत मिले।
इस उपन्यास में ‘स्व’ की जो खोज है, वह भारतीय विचार के करीब है जो किसी रहस्यमय लोक की सृष्टि किए बिना पूरी होती है ।[V.S. Naipaul, The IndianTrilogy, Panmacmillan (2016), p. 174] यह भारतीय विचार क्या है, अनंतमूर्ति के यहाँ बहुत ही साफ और स्पष्ट है – “सभी मनुष्यों को इस संसार में रहते हुए ही सम्पूर्ण सत्य का साक्षात्कार करना पड़ता है । किसी भी स्थिति में हमें इस दुनिया की समस्याओं से भागना नहीं है । किसी भए अवस्था में इस सांसारिक स्थिति से हमारा छुटकारा नहीं । इसलिए, ‘सत्य को ही भगवान मानने वाला मन धार्मिकता को आध्यात्मिकता में परिवर्तित कर देता है । ‘पंथों’ के कल्मषों को खोकर ‘पथ’ की गवेषणा में मन लग जाता है ।”[यू. आर. अनंतमूर्ति, किस प्रकार की है यह भारतीयता – (संकलन व सम्पादन : नंदकुमार हेगड़े, प्रो. नूरजहाँ बेगम), राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दिल्ली, संस्करण (2004), पृ. 21]
5.धर्मज्ञ कैसा हो?
इस उपन्यास में एक प्रश्न उठकर यह भी सामने आती है कि अगर प्राणेशाचार्य समस्या का हल नहीं कर पा रहे है, तो किस प्रकार का धर्मज्ञ होनाचाहिए, जो इस प्रकार के प्रश्न को सुलझाकर समाज का सही संचालन और नेतृत्व कर सके। ऐसे में इसकी दृष्टि के सम्बन्ध में साहसी और निर्णय क्षमता में कुशल व्यक्तित्व वाला व्यक्ति होना चाहिए।वहअपने फैसले पर हमेशा धर्म पर ही टिका न रहे।अगर उसमें कोई हल नहीं मिल रहा है, तो उसका निदान अपने विवेक से करें। जिसमें वह इस बात का ख्याल रखे कि जिस कार्य में किसी के साथ पक्षपात न हो और समस्या हल हो जाए। वहीं जो रुढि हो उसका निराकरण भी करे और धर्म सम्बन्धी नियमों को समय की मांगके अनुसार पुनः सृजित करे। अगर ऐसा नहीं होगा, तो फिर ऐसी स्थितिआनी स्वाभाविक है।
वे लिखते हैं –“परम्परा से मेरा झगड़ा किसी बाहरी व्यक्ति का सा नाता नहीं रखता, बल्कि उसके भीतर बसे व्यक्ति का सा नाता है मेरा । इसलिए मैं उसमें अपने आप को एक आलोचनशील अन्तर्वासी की तरह पाता हूँ । कन्नड़ साहित्य की परम्परा से भी मुझे अपने इस प्रयत्न में मार्ग-दर्शन मिलता है । हमारे आदि कवि पम्प स्वयं जैन होते हुए भी एक हिन्दू राजा के दरबार में रहे और कन्नड़ में महाभारत की रचना की । पम्प के महाभारत के वास्तविक नायक अर्जुन या कृष्ण नहीं हैं वहाँ वास्तविक नायक कर्ण है जो स्वयं कई तरह से वर्ण-व्यवस्था के ऊँच-नीच का शिकार हुआ था । बारहवीं सदी के हमारे महान शिव-भक्त वचनकार संत कवि वर्ण-व्यवस्था की, वेद की अपौरुषेयता को चुनौती देते हैं । उन्हीं दिनों महाकवि बासवण्णा ने ब्राह्मण कन्या का विवाह एक अछूत से कराया था ।’’ (यू. आर. अनंतमूर्ति, किस प्रकार की है यह भारतीयता – (संकलन व सम्पादन : नंदकुमार हेगड़े, प्रो. नूरजहाँ बेगम), राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दिल्ली, संस्करण (2004), पृ. 75)
वे आधुनिकता के सन्दर्भ में चिनुवा अचिबे के साथ अपनी बातचीत में वे किसी भी तरह के इकहरे यथार्थ भाव-बोध और विचार-बोध को आधुनिकता विरोधी मानते है। उनकी दृढ आस्था है कि हमारी आधुनिकता इस लोकतान्त्रिक-प्रक्रिया और संघर्ष से निर्धारित होगी कि उसमें विभिन्न धर्मों, विभिन्न विचारों और मान्यताओं के साथ विविध जातियों और वर्णों की समाई कितनी है। एक जाति, एक धर्म एक संस्कृति, एक विचार ये सब तानाशाही को बढ़ाते है।
4.अस्तित्व के प्रश्न (नारणप्पा बनाम प्राणेशाचार्य)
इस उपन्यास में व्यक्ति अस्तित्व की सांस्कृतिक दृष्टि एक महत्वपूर्ण रूप में सामने आती है।जिसमें एक ओर प्राणेशाचार्य है, जो धर्म- शास्त्रों पर विश्वास करते हैं और उसके माध्यम से रहने के पक्षधर है और नारणप्पा अपने तरीके से। जिसमें अस्तित्व की सांस्कृतिक दृष्टि क्या होगी इसके सवाल को सामने रखते है। नारणप्पा कहता है कि देखते है आपकी जीत होती है या मेरी। परंपरा से चली आ रही मान्यता है कि सारे प्रश्नों का उत्तर शास्त्रों में जिसके कारण वो खुद से हल न निकालकर शास्त्र में से ही निकालने का प्रयास करते है;और जब नहीं मिलता तो कभी खुद को अयोग्य मानते है तो कभी इसे अपनी हार समझने लगते हैं। यहीं वह स्थिति है जिसके कारण व्यक्ति सुधार करना नहीं चाहता क्योंकि उसे लगता है कि दूसरे से कुछ ग्रहण कर लेने से हम हार जायेंगे;हम छोटे हो जायेंगे। यहीं भावना सुधार प्रक्रिया में बाधा बनती है। इसलिए
धर्मशास्त्रों में ऐसी शंका के हल का अभाव होगा, प्राणेशाचार्य के लिए यह विचार भय का कारण बना हुआ था ।… सनातन शास्त्रों में यदि इस प्रश्न का उत्तर नहीं है तो समझना चाहिए कि नारणप्पा की ही जीत हुयी और मेरी हार । मूल प्रश्न था, नारणप्पा के जीवित रहते समय क्यों नहीं उन्होंने उसे समाज बहिष्कृत किया ? क्या उसकी यह धमकी, कि वह मुसलमान बन जाएगा, ही उसका कारण था ? उस धमकी से ही डरकर क्यों वे धर्मशास्त्र की अवहेलना कर चुके थे ?... क्या उसके मुसलमान होकर अग्रहार में रहने की धमकी के कारण ही उसका बहिष्कार नहीं किया गया था ? नहीं । उसके प्रति कुछ सहानुभूति भी थी । अपने हृदय में अपार करुणा के ही कारण... । यह विचार आते ही उन्होंने सोचा, ‘छी: छी: ये तो अपने को धोखा देने के बराबर है । वह कलुषहीन करुणा नहीं थी ।’ उसके पीछे भयंकर हठ भी था । नारणप्पा के हठ से पराजित होने के लिए वे तैयार नहीं थे । ‘उसे धर्म के मार्ग पर लाकर ही छोड़ूँगा – अपनी पुण्य की शक्ति से, तप की शक्ति से, प्रति सप्ताह दो दिन के उपवास[15] की शक्ति से, उसमें सन्मति जाग्रत करूँगा’ – ऐसा था उनका अवश हठ ।”[16] परंतु, अब प्राणेशाचार्य से सब कुछ छूटता जा रहा है, उन्हें सब कुछ डूबता हुआ सा प्रतीत हो रहा है । यम, नियम, संयम तप सब कुछ । अब वे क्या करें ? सभी तरह के भरोसे से मन डिगता जा रहा है, कहीं कोई राह नजर नहीं आती । किस भरोसे गांव वालों को वे अब नारणप्पा का शव-संस्कार किए जाने की युक्ति दें ? गाँव वालों का भी भरोसा उनके ऊपर से उठ जाएगा । अब तो बस ईश्वर ही कोई राह दिखाएँ तो दिखाएँ । अब तो उन्हीं का एक भरोसा है – एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास । इसलिए, अगले दिन वे एकदम सुबह ही स्नानादि से निवृत्त होकर अग्रहार से कुछ दूर हनुमान जी के मंदिर पहुँचते हैं, कि अब सबके संकटमोचन हनुमान ही इस महासंकट से उन्हें मुक्त करेंगे । पर, यहाँ भी पहर, दोपहर, शाम फिर रात होने को आई किन्तु हनुमान जी की ओर से कोई जवाब कोई संकेत नहीं – न हाँ का न नहीं का । प्राणेशाचार्य यह चाहते हैं कि हाँ या ना कोई भी तो संकेत मिले।
इस उपन्यास में ‘स्व’ की जो खोज है, वह भारतीय विचार के करीब है जो किसी रहस्यमय लोक की सृष्टि किए बिना पूरी होती है ।[V.S. Naipaul, The IndianTrilogy, Panmacmillan (2016), p. 174] यह भारतीय विचार क्या है, अनंतमूर्ति के यहाँ बहुत ही साफ और स्पष्ट है – “सभी मनुष्यों को इस संसार में रहते हुए ही सम्पूर्ण सत्य का साक्षात्कार करना पड़ता है । किसी भी स्थिति में हमें इस दुनिया की समस्याओं से भागना नहीं है । किसी भए अवस्था में इस सांसारिक स्थिति से हमारा छुटकारा नहीं । इसलिए, ‘सत्य को ही भगवान मानने वाला मन धार्मिकता को आध्यात्मिकता में परिवर्तित कर देता है । ‘पंथों’ के कल्मषों को खोकर ‘पथ’ की गवेषणा में मन लग जाता है ।”[यू. आर. अनंतमूर्ति, किस प्रकार की है यह भारतीयता – (संकलन व सम्पादन : नंदकुमार हेगड़े, प्रो. नूरजहाँ बेगम), राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दिल्ली, संस्करण (2004), पृ. 21]
5.धर्मज्ञ कैसा हो?
इस उपन्यास में एक प्रश्न उठकर यह भी सामने आती है कि अगर प्राणेशाचार्य समस्या का हल नहीं कर पा रहे है, तो किस प्रकार का धर्मज्ञ होनाचाहिए, जो इस प्रकार के प्रश्न को सुलझाकर समाज का सही संचालन और नेतृत्व कर सके। ऐसे में इसकी दृष्टि के सम्बन्ध में साहसी और निर्णय क्षमता में कुशल व्यक्तित्व वाला व्यक्ति होना चाहिए।वहअपने फैसले पर हमेशा धर्म पर ही टिका न रहे।अगर उसमें कोई हल नहीं मिल रहा है, तो उसका निदान अपने विवेक से करें। जिसमें वह इस बात का ख्याल रखे कि जिस कार्य में किसी के साथ पक्षपात न हो और समस्या हल हो जाए। वहीं जो रुढि हो उसका निराकरण भी करे और धर्म सम्बन्धी नियमों को समय की मांगके अनुसार पुनः सृजित करे। अगर ऐसा नहीं होगा, तो फिर ऐसी स्थितिआनी स्वाभाविक है।
मीनाक्षी मुखर्जी लिखती हैं, “एक ओर समय से पहले बुढ़ा गए प्राणेशाचार्य है ,जिन के सिर पर सभी धर्मग्रंथों के ज्ञान का बोझ लदा है और मरणशील अग्रहार की जिम्मेदारी का बोझ कंधों पर है। दूसरी और ऐसा बच्चा है जो सृजन पर प्रतिक्रिया करना सीख ही रहा था। दोनों के बीच सीधा विरोध है। उसके पुनर्जन्म का स्थान, अवरूद्धता के दायरे से बाहर है, उस अग्रहार से बाहर, जहाँ काल रूका हुआ है और दिशाएँ बंद हैं। अग्रहार की मौत की सड़ाध और जंगल में गीली मिट्टी तथा घास की खुशबु, दोनों को रूपक के रूप में आमने- सामने खड़ा किया गया है। इंसानों कि दमनकारी दुनिया और प्रकृति की हरी- हरी सम्पूर्ण के बीच ऐसा ही विरोघ संस्कार में देखने को मिलता है।”( Realism and Reality, Meenakshi Mukherjee, संस्कार, अनुवादक- राजेंद्र शर्मा, पृ.-176)
6. विधवा के प्रति सांस्कृतिक दृष्टि:-
विधवा को समाज में प्रायः हेय दृष्टि से देखा जाता है ऐसा माना जाता है कि इसके कारण ही इसके पति की मृत्यु हुई है, भले ही उसके पति के मौत के कारण कुछ भी हो। इस कारण विधवा को अपनी स्थिति का जिम्मेदार मान लिया जाता है, जिससे समाज में उसकी स्थिति खराब हो जाती है। इस उपन्यास में लक्ष्मीदेवम्मा के माध्यम से रचनाकार ने उसे सामने लाकर उसके प्रति समाज को सोचने के लिए प्रेरित किया है कि ऐसी जो मान्यता बनी हुई है उसे बदलना चाहिए ताकि उनका जीवन जीना आसान हो पाए।
7. ज्ञानी व्यक्ति और विषयों के बीच के मान्यताओं का द्वन्द:-
कुछ मूल्य ऐसे होते है, जो एक के लिए तो सही माना जाता है पर दूसरे के लिए उससे दूरी भी रखनी आवश्यक हो जाती है। जिसके बाद दोनों उसे पूरा नहीं कर सकते इस मान्यताओं पर अनंतमूर्ति ने ध्यान खींचने की कोशिस की है। जहाँ एक ओर प्राणेशाचार्य के लिए यह जरुरी है कि वो वेश्याओं से दूर रहे वहीं वेश्याओं के लिए उन जैसे पावन व्यक्ति से गर्भ-धारण की बात करना कहीं न कहीं द्वंदात्मक है। इस सन्दर्भ में, प्रारंभ में जब चंद्री नारणप्पा की मृत्यु की सुचना देती है, तो प्राणेशाचार्य यह सोचते है कि अगर इसकी परछाई पड़ी तो अभी स्नान करना पड़ेगा। उसके लिए या यूँ कहे कि सभी ब्राह्मणों के लिए वेश्याओं से दूरी और दूसरी और यह सहवास दोनों विपरीत रूप में सामने आते है। चंद्री कहती है:
“कितने सौम्य, करुणार्द्र हैं वे ! नाटक में द्रौपदी के बुलाने पर हँसते हुये मदद को आने वाले ज्य्योतिर्मय कृष्ण की तरह हैं बेचारे । उन्हें देह के सुखों के बारे में शायद कुछ भी पता नहीं होगा । सूखी लकड़ी की तरह पड़ी रहती है उनकी अच्छी स्त्री । फिर भी कितने सहनशील हैं वे ! कैसा तेजोमय चेहरा, सरल स्वभाव है । एक दिन भी आँख उठाकर उसकी तरफ नहीं देखा । माँ कहा करती थी कि वेश्याओं को इसी तरह के पावन-पूज्य लोगों से गर्भ धारण करना चाहिए – जैसा रूप और तेज इन आचार्य जी में है । लेकिन ऐसे व्यक्ति का संग-सुख पाना भाग्य में लिखा हो तो न .... ।”
प्राणेशाचार्य दो सांस्कृतिक अव्ययों के बीच फँस जाते है। एक तरफ उनका धर्म, कर्म, संन्यासी बनकर रहने और आत्मदान का जीवन बिताने की अपनी बचपन से ही उपजी चुनौती जिसके कारण उन्होंने जानते-बूझते हुए भी जन्म से पंगु और बीमार स्त्री भागीरथी से शादी कर ली तो दूसरी तरफ पुन: चंद्री के साथ मिलने तथा उसका उपभोग करने की इच्छा। यह वस्तुत: प्राणेशाचार्य के भीतर ही दो तरफ की संस्कृति की टकराहट है। (पक्षधर पत्रिका)
डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं, “ संस्कार का नायक प्राणेशाचार्य ब्राह्मण पुरोहित की तरह बर्ताव करने के लिए तमाम कोशिश करता है, पर नैतिकता से च्युत होकर वह साधरण मनुष्य रह जाता है।” (आलोचना पत्रिक: नामवर सिंह,जनवरी-मार्च, 1972) तमाम सांस्कृतिक संघर्ष से जूझने के कारण ही उनकी यह दशा होती है।
8. ब्राह्मणत्व खोने का डर बनाम ब्राह्मण जाति से निकालने की चुनौती:-
इस उपन्यास में एक दृष्टि यह है कि ब्राह्मण जाति से निकलने से एक वर्ग इस बात से डरता है कि कहीं उन्हें ब्राह्मण समाज से अलग न कर दिया जाय। दासाचार्य कहता है “अब अगर एकदम बिना सोचे-समझे या जल्दी में इसका दाह-संस्कार करना तय कर लें तो बस हम ब्राह्मणों को कभी भी कोई भोजन-श्राद्ध पर नहीं बुलाए गए, यह निश्चित है।”(संस्कार, पृष्ठ-18) वहीं नारणप्पा ऐसा व्यक्ति है, जो अकेले ब्राह्मणों का विरोध करता है वह कहता है कि "बहिष्कार करके तो देखो।मै मुसलमान हो जाऊंगा और तुम सबको खम्भे से बंधवाकर तुम्हारे मुहँ में गोमांस ठूस-ठूस दूंगा और देखूंगा कि तुम्हारा ब्राह्मणत्व मिट्टी-मिट्टी हो जाये।"
यहाँ भी यह दृष्टि देखने को मिलती है कि जो व्यक्ति समाज के भरोसे है, जिनका भरण पोषण ही अपने ब्राह्मणत्व के नाम पर हो रहा है या जिनकी प्रतिष्ठा बनी हुई है उन्हें ही इसका डर है। जो ब्राह्मणत्व के अलावा अन्य कार्यो से जुड़ा है उसे इससे डरने की आवश्यकता नहीं रह रही है। यहाँ अगर सांस्कृतिक रूप से देखें तो पातें है कि आजादी के बाद संविधान में सबके लिए समानता की बात होने से धर्म के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जा सकता अर्थात् यहाँ धर्म के नियम अनुपयोगी सामने आते है।
9. पुराण सम्बन्धी ज्ञान और पालन करने के लिए कहे जाने वाले ज्ञान में अंतर:
ब्राह्मणों में एक बात तो यह कहीं जाती है कि उन्हें नियम और धर्म-ग्रन्थ के साथ नियमों का पालन करना चाहिए पर उसमें यह बताया जाता है कि इस ऋषि ने इस कन्या के साथ सहवास किया; इस ऋषि ने इस मतस्यगंधा कन्या को नाव में ही गर्भवती कर दिया और इसके बाद शिक्षा देते है निरस जीवन जीने का। नारणप्पा कहता है "आप रस और कामाख्यानों से पूर्ण पुराणों का पाठ करते हैं और उपदेश देते है नीरस जीवन का"
मीनाक्षी मुखर्जी इसके सन्दर्भ में लिखती है "संस्कार को सिर्फ रुढ़िवादी हिन्दू धर्म की आलोचना की तरह पढ़ना उसे बहुत संकुचित कर देना होगा। यह एक उल्लेखनीय उपन्यास सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसमें एक पतनशील मूल्य व्यवस्था की नकार है। बल्कि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकिइसमें भौतिक अधिभौतिक लौकिक और परलौकिक तार परस्पर जुड़ते है,जिसमें एक व्यक्ति की सामाजिक दुर्गति के आंतरिक पहलुओं को उनकी आंतरिक जटिलता के साथ पकड़ा गया है, जिसमें समस्या अनोखे ढंग से निजी समस्या होने के बावजूद एक ऐसे सभ्यता संकट को भी सामने लाती है, जिसमें सामूहिक नियमबद्धता की पीड़ादायक प्रक्रिया के बीच से निजी चयन के लिए जगह बन रही है।
स्त्री-पुरुष के काम-सम्बन्धों में धर्म-शास्त्र द्वारा बनाए गए भय,पाप, दुराचार, अनैतिकता, स्वर्ग, नरक, आदि के विधि-निषेध और तद्जनित उन ग्रंथियों और दमित इच्छाओं के परस्पर संघाती चित्र यह उपन्यास बहुत ही तार्किकता के साथ पेश करता है । पौराणिक पोथियों के ‘पाठ’ में वर्णित स्त्रियाँ व उनके सौन्दर्य का भोग-उपभोग करने वाले ऋषि और उसके ठीक उलट उन्हीं पुराण-पोथियों से संचालित वास्तविक जीवन, दोनों में इस कदर भेद क्यों ? भोग और निरोध की जो मनःसंरचना है, पापाचार और सदाचार की जो पाप-पुण्य रचित भय जनित दुविधा है, उस भय और दोहरेपन या द्विविधा ( ambiguity) को यह उपन्यास, नारणप्पा-चंद्री और प्राणेशाचार्य-चंद्री, श्रीपति-बेल्ली के संबंध के सहारे बहुत गहरे तक विश्लेषित करता है।(पक्षधर पत्रिका)
“जो लड़की सुख नहीं देती, उसके साथ कौन जिंदगी चलाएगा आचार्य जी, सिर्फ बेकाम ब्राह्मणों के सिवा?” (संस्कार,पृष्ठ-31)
पुराने जड़ हो चुके दक़ियानुसी मान्यताओं और विचारों को छोड़कर, नए पथ की गवेषणा ही प्रगति का लक्षण है । इस लिहाज से अनंतमूर्ति का नायक प्राणेशाचार्य एक प्रगतिशील चरित्र है ।(पक्षधर पत्रिका)
डॉ. मीनाक्षी मुखर्जी लिखती हैं, “उपन्यास का केंद्रीय पात्र, सामाजिक रूप से व्यवह्रत धार्मिक परंपरा की एक अमानवीकरणकारी विधि-निषेध व्यवस्था को ठुकराने का प्रयास करता है और उपन्यास के आखिर तक हम नहीं जान पाते हैं कि खुद को मुक्त करने में उन्हें कितनी कामयाबी मिल पाएगी। आचार्य का संघर्ष स्वत: स्फूर्तता का गला घोंटने वाले मताग्रह से है।” (Realism and Reality, Meenakshi Mukherjee, संस्कार,अनुवादक- राजेंद्र शर्मा, पृ.-180)
इस प्रकार संस्कार उपन्यास में अनंतमूर्ति ने धर्म शास्त्र और लोक जीवन के अंतर, आजादी के बाद धर्म के प्रभाव का कम होना या अनुपयोगी होने से लेकर स्त्री पुरुष सम्बन्ध और उसके धर्म आधारित मान्यताओं पर प्रकाश डालते हुए पुराने ढहते मूल्यों को सामने लाये है।